विंटर ब्रेक
'सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है'। शहरों में परेशान लोगों की जिंदगी पर शहरयार की ये नज्म सर्दी आते ही लबों पर खुद-ब-खुद आ जाती है। लिखी थी किसी और वजह से पर आज प्रदूषण पर फिट बैठती है। शहरों की हवा जहरीली होती जा रही है। सांस लेना मुश्किल हो रहा है। देश की राजधानी दिल्ली प्रदूषण को लेकर बदनाम है, लेकिन सीन सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। छोटे शहर भी वायु प्रदूषण की गोद में समा चुके हैं। ठंड के आते ही ठंडे बस्ते में बंद प्रदूषण का जिन्न हर साल बाहर निकल आता है। हर ओर धुआं-धुआं सा कर देता है।
प्रदूषण के मामले में हम काफी प्रगतिशील हैं। तरक्की और आधुनिक जीवन शैली हासिल करने के लिए पहले पानी को प्रदूषित किया, अब हवा भी सांस लेने लायक नहीं छोड़ी है। पानी प्यूरीफायर से एयर प्यूरीफायर तक का सफर कुछ ही सालों में तय कर लिया है। पीने को साफ पानी नहीं है और लेने को शुद्ध हवा। स्वीट होम में आरओ के बाद एयर प्यूरीफायर एक कोने में जगह बना रहे हैं। एयर प्यूरीफायर उभरता हुआ स्टार्टअप है। सर्दी की आहट के साथ एयर प्यूरीफायर का बाजार गरम होने लगता है। घर के अलावा गाड़ियों में भी हवा साफ करने के उपकरण लगाए जा रहे हैं। यह अब कारों का एक फीचर है। सरकार भी हवा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए मशीनें खरीद कर चैराहों पर खड़ी कर रही हैं। इनको निहारकर हम अपनी तरक्की का अंदाजा लगा सकते हैं।
वायु प्रदूषण के मामले में राजधानी अव्वल नहीं है। यहां प्रदूषण खतरनाक स्तर पर रहता जरूर है, लेकिन दूसरे शहर दिल्ली को मात दे रहे हैं। दिल्ली से लगे यूपी का हाल खराब है। गाजियाबाद और नोएडा साल में कई बार देश के सबसे प्रदूषित शहरों की लिस्ट में शामिल होते हैं। अक्सर देखा जाता है कि दिल्ली से ज्यादा (एक्यूआई एयर क्वालिटी इंडेक्स) इन दोनों शहरों में दर्ज होता है। यह दिल्ली के प्रदूषण का असर हो सकता है, लेकिन मेरठ, हापुड, बुलंदशहर जैसे छोटे शहर प्रदूषण के नित नए रिकाॅर्ड बनाते रहते हैं। सूबे की राजधानी लखनऊ भी वायू प्रदूषण से कराह रही है। कानपुर, मुरादाबाद फतेहबाद जैसे शहरों में प्रदूषण की पीक देखने को मिलती है। बात केंद्र शासित प्रदेश और किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, महाराष्ट समेत कई अन्य राज्यों में एक्यूआई मानक से कहीं अधिक हो जाता है।
वायु प्रदूषण बढ़ने के कई कारण है। इनमें बढ़ते वाहन, उधोगों से निकलने वाला धुआं और धूल शामिल है। शहरों में यह सभी कारण मौजूद हैं, इसलिए प्रदूषण बढ़ जाता है। एक कारण पराली भी है। इसको लेकर जितनी राजनीति होती है, अगर उतना काम सरकारें जमीन पर कर लें तो इसका असर हवा पर दिखेगा। एक बात तो साफ है अगर हवा को शुद्ध रखना है तो जमीन पर कार्रवाई करनी होगी। शहर से लेकर खेत प्रदूषण फैला रहे तत्व और कारणों को दूर करना होगा। केंद्रीय, राज्य और क्षेत्रीय स्तर पर योजनाबद्ध और समन्वित तरीके से काम करना होगा। कहने के लिए कंक्रीट के जंगल बना दिए, लेकिन यहां भी धूल का गुब्बार है। सबसे पहले तो शहरों को धूल से मुक्त करना होगा। इससे हम आधा प्रदूषण तो कम कर ही सकते हैं।
बड़े ही नहीं छोटे शहर भी वायु प्रदूषण से त्रस्त हैं। रोकथाम के लिए सबको मिलकर प्रयास करने होंगे। शहरों से धूल का सफाया करना होगा। बढ़ते वाहनों की संख्या का विकल्प तैयार करना होगा। समन्वित प्रयास की जरूरत है।
- विपिन धनकड़
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बहुत अच्छा आर्टिकल लिखा है भाई आपने ऐसे ही लिखते रहिए समाज को जागरूक करते रहिए
जवाब देंहटाएंधन्यवाद सर।
हटाएंदिल्ली देश की राजधानी है इसलिए लाइम लाइट मैं आ गई और बदनाम हो गई अगर दिल्ली के साथ एनसीआर भी जोड़ देते तो शायद बदनामी और बलिष्ठ लगती दिल्ली से ज्यादा बुरा हाल गाज़ियाबाद का है फिर भी कुछ पर्यावरण विरोधी अभी से पटाखे जला कर प्रदूषण की बढ़ोत्तरी मैं चार चांद लगा रहे है
जवाब देंहटाएंसही कहा सर।
हटाएंसही फरमाया सर
जवाब देंहटाएंधन्यवाद सर।
हटाएंI thoroughly enjoyed reading it. Very well written article. Love the content and way of writing.
जवाब देंहटाएंधन्यवाद सर।
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